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खेजड़ली बलिदान: जिस इतिहास को लिखते हाथ कांपते हैं।

खेजड़ली बलिदान: जिस इतिहास को लिखते हाथ कांपते हैं।

खेजड़ली बलिदान: जिस इतिहास को लिखते हाथ कांपते हैं।
खेजड़ली बलिदान:
 जिस इतिहास को लिखते हाथ कांपते हैं। 

कान खड़े कर हिरन कातर निगाहों से वो दृश्य देख रहे थे। चिड़ियों ने झुण्ड में चहक कर अपना विरोध दर्ज करवाया। नेवले ने अपने बिल के किनारे दोनों पाँवों पर खड़े होकर अपने बच्चों को बिल में जाने का निर्देश दिया। झाळ की गहरी खोह में कमेडी और कबूतरों ने अपने अपने अपने बच्चों को पंखों से ढक दिया और डबडबाती आंखों के साथ उनके शरीर में फड़कन होने लगी।

यह क्या अपनी 'बाई' पर यह कुल्हाड़ी कौन चला रहे हैं? अभी महीनेभर पहले ही पाँव संभालने वाले हरिन ने फुँफकार भर आगे के पैरों को विरोध स्वरूप उछाला लेकिन उस वातावरण में अहिंसा के संस्कारों के प्रबल रहते समझ नहीं आया कि करें क्या? बाई के हाथ चुग्गा चुगने वाले मोर ने आसमान को चीर देने वाली मदद की गुहार लगाई।

उस शाम उस आवाज से परेशान रक्तरंजित बादलों से तप्त सूरज ने पूछा यह सब क्या है? बादलों ने बताया कि जोधपुर के एक महाराजा ने खेजड़ली गाँव की खेजड़ियों को काटने का आदेश दिया था। इमरती बाई सिर कटा देगी पर प्राणों की तरह पाले इन वृक्षों को नहीं कटने देगी। इमरती बाई की बेटियां आशु, रतनी और भागु ने भी खेजड़ी की रक्षा के लिए प्राण दे दिये। इस तरह गाँव की 71 महिलाओं एवं 292 पुरुष मिलाकर 363 पर्यावरणप्रेमी गुरु जम्भ शिष्यों ने सिर कटा दिया पर पेड़ को नहीं कटने दिया।


सन् 1730 में उस दिन सूरज उदास चेहरा लिए छुप गया।

दूसरे दिन सूरज जब फिर से खेजड़ली के रास्ते निकला तो भादवे के बादलों के पीछे मुँह छुपा कर खूब रोया। गिलहरियां, कबूतर, कमेडी, नेवले, चिड़ियाओं और मोर की आबाद बस्ती में जैसे ही चाँद उगता है मोर सबका प्रतिनिधित्व करके चाँद को ही इमरती समझ करुणामय पुकार करता है आज भी ग्रामीणों के कलेजे के टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं।

लेखक: खेजड़ली बलिदान: जिस इतिहास को लिखते हाथ कांपते हैं।
अर्जुन सिंह साँखला
Lucky Institute Jodhpur

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